Saturday, March 1, 2014

वैकुण्ठ धाम



ज़िन्दगी की धारा में पाँव डाले बैठी हुँ।और उसे बहते देेख रही हु। मै यहाँ क्यों हु ? मैं क्या कर रही हु इस धरती पर प्रभु ?मै तो यहाँ की हु भी नहीं फिर भी यहाँ होते हुए दिख रही हु। क्या मैं जीवित हु या मृत हुँ ? मैं तो न मर सकती हु न जी सकती हु। यह दोनों भाव मेरे लिए तो अब कोई भाव नहीं रखते।कुछ बेचैनी सी हैं मेरा अब यहाँ (धरती पर )मन नहीं लगता .


हर आत्मा परमात्मा से मिलने को व्याकुल हैं। उस परमधाम को अव्यक्त तथा अविनाशी कहा जाता हैं और वही परम तीर्थ परम गन्तव्य हैं। जब कोई वह जाता तो कभी वापिस नहीं लौटता। उस परम लोक के रास्ते में वैकुण्ठ धाम पड़ता हैं। यह लोक श्रीहरि विष्णु का निवास स्थल हैं। श्री हरी विष्णु कि कृपा के बिना कोई भी आत्मा केवल अपने प्रयास से अपने पूर्ण ब्रह्म स्वरुप को नहीं देख सकती। श्रीहरि विष्णु देवाये नमः। समस्त ब्रह्महान्डiये नमः। ……………

भय --- सम्भोग

अज्ञानता ,संभोग ,भय तीनो में नशा हैं। लोग अज्ञानता में रहना ज्यादा पसंद करते हैं क्युकी अज्ञानता में मूर्छा हैं और मूर्छा में नशा हैं। पूरी दुनिया इस तरह के नशे में रहना पसंद करती हैं। इस नशे में ही उन्हें सुख मिलता हैं। शराबी को देखा हैं? शराब के नशे में वह मस्त रहता हैं। उसके लिए वही सच्ची दुनिया हैं ,वह उस मद से बाहर आकर दुनिया के यथार्थ का सामना नहीं करना चाहता। उसी तरह अज्ञानता की गहरी मूर्छा को तोड़ कर सत्य को रुबरु देखने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए। यह ऐसा ही होगा जैसे गहरे रंग से रंगे शीशे को खुरच कर उस में से धुप को भीतर आने का जगह बनाया जाए। नशे की आदत को छोड़ना कठिन होता हैं और नशेड़ियो की जमात से निकल कर अकेले खड़े होना उस से भी ज्यादा कठिन। मेरी आत्मा रोती हैं जब मैं जीवंत आत्मा को शरीर के मोह में ,शरीर के मद में डूब कर इस तरह मूर्छित जीते हुए देखती हु। आत्मा प्रकाश हैं। तुम प्रकाश पुंज हो। तुम्हारा काम अँधेरे का नाश करना हैं। अँधेरे में आकर खुद का ही अस्तित्व खो देना नहीं हैं। भीतर के सूर्य की ओज को बढ़ाओ और अज्ञानता रूपी अंधकार से जागो। हरिओमतत्सत _()_

BHAV SAMADHI

what is bhav samadhi ? while praying or talking to GOD when one looses its senses of I and becomes one with the energy of GOD ,it is bhav samadhi .Meera bai ,Ramkrishna paramhans ,Chaitanya maha prabhu and many other who dissolved and are dissolving in supreme bliss through bhakti marg experience bhav samadhi .when this bhav samadhi gets deeper and deeper it becomes nirvikalp samadhi .when one thinks about GOD ,prays to god or talk to GOD with deep surrendering and concentration .... one enters in bhav samadhi .A bhakta can be in bhav samadhi for several hours and days . The state of samadhi is attained when one is truly dedicated to SELF SEARCH and puts all its soul energy into it .when the emotions of the mind are channelled into one-pointed concentration towards GOD ,one slowly looses the sense of I .The energy of the bhakta and bhagwan becomes one. Samadhi" is a state of consciousness in which the mind becomes completely still (one-pointed or concentrated) and the consciousness of the experiencing subject becomes one with the experienced object.Through bhav samadhi one slowly enters in nirvikalp samadhi .From where there is no returning back .The soul gets free of the circle of life and death . Through deep surrendering the bhakta opens the doors of the city of GOD and enters in it .

Thursday, January 30, 2014

ARE YOU SPENDING TIME WITH PAIN AND MISERY ?

ARE YOU SPENDING TIME WITH PAIN AND MISERY ?
Hmmm okkk this is also fine .This moment pain is your fellow mate ..now make pain your best friend and live its presence very very aware fully. Live it with full intensity and accept that you are in pain . If you really want to dive within then make pain your method of meditation . when you are in deep pain then don't fight with it .. become a spy of self and investigate within ...How my mind is working this moment ? what types of thoughts are coming in my mind ? what is the rhythm of my breath ? is it very fast or normal or very slow ? where in my body I am feeling pain ? what is the source of my pain ? keep investigating while tears are flowing from your eyes or your heart is aching .......let them respond to emotion of pain .don't stop your tears ......don't stop your mind ...JUST WATCH AND TRY TO INVESTIGATE .....MAKE PAIN YOUR METHOD OF MEDITATION . Feel within ...one part of me is body and other part of me is consciousness .Let your consciousness witness your body mind .

Wednesday, January 22, 2014

LOVE IS THE PASSAGE



WHY IS LOVE IMPORTANT ?
GOD is nothing but energy .Love teaches you the art of dissolving with the other soul . soul is also energy . The moment you know the art of dissolving with another soul ,you know the art of dissolving in the ultimate SOUL . In the SUPREME ENERGY .
Here we can even say that LOVE BECOMES THE PASSAGE to enter in the void . WHY SO MANY GOPIS WHERE IN LOVE WITH KRISHNA ? Because Krishna was the master soul ..THE GATE for other souls to pass . He took many souls who were in form of gope and gopis towards baikunth dham ( the place of lord vishnu in other dimension )

Tuesday, January 14, 2014

To attain KNOWLEDGE is big thing ,then to absorb it in one self is much bigger thing ,then to digest it is much bigger and to get detach from it is real wisdom .

Saturday, January 11, 2014

Photo: बुद्ध ने संघं शरणं गच्छामि क्यों कहा? कृपाकर हमें इसका अभिप्राय समझाएं।ये हैं तीन रत्न—

बुद्धं शरणं गच्छामि,

संघं शरणं गच्छामि,

धम्मं शरणं गच्छामि।
 इनके पीछे एक तर्कसरणी है। समझो।
पहले तो बुद्ध के प्रति। बुद्ध का अर्थ गौतम बुद्ध नहीं है। इस भ्रांति में मत पड़ना। बुद्ध का अथई है, बुद्धत्व। 
दूसरी समर्पण की धारणा है—संघं शरणं गच्छामि। संघं का अर्थ होता है, उन सबको जो जागे हैं। उन सबको जो जाग रहे हैं। उन सबको जो जागने के करीब आ रहे। उन सबको जो करवट ले रहे. इसका मूल अर्थ तो यही हुआ न कि जिन्होंने स्रोत में प्रवेश कर लिया, जो स्रोतापन्न फल को प्राप्त हो गए। जिन्होंने संन्यास लिया है.
।संघं शरणं गच्छाम

और भी एक कदम आगे बात उठती है, क्योंकि संघ की शरण जाने का अर्थ हुआ, जो सत्य की खोज कर रहे हैं उनकी शरण जाता हूं। बुद्ध की शरण जाने का अर्थ हुआ, जिसने सत्य पा लिया है उसकी शरण जाता हूं। 
 धम्मं शरणं गच्छामि का अर्थ होता है, बुद्ध की शरण भी तो इसीलिए गए न कि उन्होंने सत्य को पा लिया, और संघ की शरण भी इसीलिए गए न कि वे सत्य की खोज में जा रहे हैं, तो सत्य की ही शरण जा रहे हो, चाहे बुद्ध की शरण जाओ, चाहे संघ की शरण जाओ। इसलिए, धम्मं शरणं गच्छामि।
धम्म का अर्थ होता है सत्य। जो परम सत्य है, वही धर्म है।तो तीसरा रत्न है—धम्मं शरणं गच्छामि। तीसरी शरण में जाकर तुम समस्त की शरण में चले गए—सार्वभौम है धर्म। पहले बुद्ध की शरण में गए, वह एक; फिर संघ की शरण में गए, अनेक, फिर धर्म की शरण में गए, सर्व। सार्वभौम। विसर्जन पूरा हो गया। इसके पार विसर्जन करने को कुछ है नहीं। तुम उससे एक हो गए, जो है।तो तीसरा रत्न है—धम्मं शरणं गच्छामि। तीसरी शरण में जाकर तुम समस्त की शरण में चले गए—सार्वभौम है धर्म। पहले बुद्ध की शरण में गए, वह एक; फिर संघ की शरण में गए, अनेक, फिर धर्म की शरण में गए, सर्व। सार्वभौम। विसर्जन पूरा हो गया। इसके पार विसर्जन करने को कुछ है नहीं। तुम उससे एक हो गए, जो है।
बुद्ध ने संघं शरणं गच्छामि क्यों कहा? कृपाकर हमें इसका अभिप्राय समझाएं।
ये हैं तीन रत्न—

बुद्धं शरणं गच्छामि,

संघं शरणं गच्छामि,

धम्मं शरणं गच्छामि।

पहले तो बुद्ध के प्रति। बुद्ध का अर्थ गौतम बुद्ध नहीं है। इस भ्रांति में मत पड़ना। बुद्ध का अथई है, बुद्धत्व। 
दूसरी समर्पण की धारणा है—संघं शरणं गच्छामि। संघं का अर्थ होता है, उन सबको जो जागे हैं। उन सबको जो जाग रहे हैं। उन सबको जो जागने के करीब आ रहे। उन सबको जो करवट ले रहे. इसका मूल अर्थ तो यही हुआ न कि जिन्होंने स्रोत में प्रवेश कर लिया, जो स्रोतापन्न फल को प्राप्त हो गए। जिन्होंने संन्यास लिया है.
    

  संघं शरणं गच्छामि  


 संघ की शरण जाने का अर्थ हुआ, जो सत्य की खोज कर रहे हैं उनकी शरण जाता हूं। बुद्ध की शरण जाने का अर्थ हुआ, जिसने सत्य पा लिया है उसकी शरण जाता हूं। 

धम्मं शरणं गच्छामि का अर्थ होता है, बुद्ध की शरण भी तो इसीलिए गए न कि उन्होंने सत्य को पा लिया, और संघ की शरण भी इसीलिए गए न कि वे सत्य की खोज में जा रहे हैं, तो सत्य की ही शरण जा रहे हो, चाहे बुद्ध की शरण जाओ, चाहे संघ की शरण जाओ। इसलिए, धम्मं शरणं गच्छामि।
धम्म का अर्थ होता है सत्य। जो परम सत्य है, वही धर्म है।
तो तीसरा रत्न है—धम्मं शरणं गच्छामि। तीसरी शरण में जाकर तुम समस्त की शरण में चले गए—सार्वभौम है धर्म। पहले बुद्ध की शरण में गए, वह एक; फिर संघ की शरण में गए, अनेक, फिर धर्म की शरण में गए, सर्व। सार्वभौम। विसर्जन पूरा हो गया। इसके पार विसर्जन करने को कुछ है नहीं। तुम उससे एक हो गए, जो है।तो तीसरा रत्न है—धम्मं शरणं गच्छामि। तीसरी शरण में जाकर तुम समस्त की शरण में चले गए—सार्वभौम है धर्म। पहले बुद्ध की शरण में गए, वह एक; फिर संघ की शरण में गए, अनेक, फिर धर्म की शरण में गए, सर्व। सार्वभौम। विसर्जन पूरा हो गया। इसके पार विसर्जन करने को कुछ है नहीं। तुम उससे एक हो गए, जो है .